महालयारम्भ 2 सितम्बर से व पितृपक्ष 3 सितम्बर से 17 सितंबर तक. पितरों का श्राद्ध न करने वालों को पग पग पर मिलता है कष्ट-पं.बृजेश पाण्डेय ज्योतिषाचार्य

महालयारम्भ 2 सितम्बर से व पितृपक्ष 3 सितम्बर से 17 सितंबर तक.
पितरों का श्राद्ध न करने वालों को पग पग पर मिलता है कष्ट-पं.बृजेश पाण्डेय ज्योतिषाचार्य

भारतीय विद्वत् महासंघ के महामंत्री व भारतीय युवा जनकल्याण समिति के संस्थापक संरक्षक पं.बृजेश पाण्डेय ज्योतिषाचार्य ने शास्त्र व पुराण अनुसार बताया कि पितृपक्ष तीन सितम्बर से उदया तिथि में प्रारंभ हो रहा है परंतु श्राद्ध मध्याह्न व्यापिनी किया जाता है जो 3 को मध्याह्न में द्वितीया तिथि लग जा रहा है इस आधार पर 2 सितम्बर को पहले दिन श्राद्ध करने वालों की तिथि होगी,पितृपक्ष में पुर्णिमा तिथि नहीं मिलता है इसलिए पुर्णिमा तिथि में मरे प्राणी का श्राद्ध एक दिन पहले ही करें, भाद्रपद पूर्णिमा एक सितम्बर को किया जाएगा, इस दिन नाना- नानी का श्राद्ध करने का बिधान है अज्ञात तिथियों का श्राद्ध एवं पितृविसर्जन 17 सितंबर को किया जाएगा!
पं बृजेश पाण्डेय ज्योतिषाचार्य के अनुसार प्रतिपदा का श्राद्ध 2 सितम्बर,द्वितीया तिथि का श्राद्ध 3 सितम्बर, तृतीया तिथि का श्राद्ध 4 सितंबर, चतुर्थी तिथि का श्राद्ध 6 सितंबर, रविवार पंचमी तिथि का श्राद्ध 7 सितंबर, सोमवार को षष्ठी तिथि का श्राद्ध 8 सितंबर, मंगलवार को सप्तमी तिथि का श्राद्ध 9 सितंबर, बुधवार को अष्टमी तिथि का श्राद्ध 10 सितम्बर, बृहस्पतिवार को नवमी तिथि का श्राद्ध 11 सितंबर,शुक्रवार को दशमी तिथि का श्राद्ध 12 सितंबर, शनिवार को एकादशी तिथि का श्राद्ध 13 सितंबर, रविवार को द्वादशी तिथि का श्राद्ध 14 सितंबर, सोमवार को त्रयोदशी तिथि का श्राद्ध 15 सितंबर, मंगलवार को चतुर्दशी तिथि का श्राद्ध 16 सितंबर, बुधवार 17 दिसंबर को अमावस्या तिथि एवं अज्ञात तिथि का श्राद्ध तथा इसी दिन सर्वपैत्री अमावस्या तथा पितृपक्ष (पितरों) का बिसर्जन किया जाएगा.
पं बृजेश पाण्डेय ज्योतिषाचार्य ने यह भी बताया कि महिलाओं के लिए जिवत्पुत्रिका व्रत 10 सितम्बर बृहस्पतिवार को किया जाएगा तथा मातृनवमी श्राद्ध सौभाग्यवती स्त्रियों के लिए श्राद्ध 11 सितंबर को किया जाएगा इसी दिन जिवत्पुत्रिका व्रत रहने वाली महिलाएं व्रत का पारण करेगी पं बृजेश पाण्डेय ज्योतिषाचार्य ने श्राद्ध की परिभाषा बताते हुए कहा कि पितरों के उद्देश्य से विधिपूर्वक जो कर्म श्रद्धा से किया जाता है उसे श्राद्ध कहते हैं,
“श्रद्धया पितृन् उद्दिश्य विधिना क्रियते यत्कर्म तत् श्राद्धम्”
श्रद्धा से ही श्राद्ध की निष्पत्ति होती है,
“श्रद्धार्थमिदं श्राद्धम्, श्रद्धया कृतं सम्पादितमिदम्, श्रद्धया दीयते यस्मात् तत् श्राद्धम्”तथा श्रद्धया इदं श्राद्धम् /अर्थात अपने मृत पितृगण के उद्देश्य से श्रद्धापूर्वक किए जाने वाले कर्म विशेष को श्राद्ध शब्द के नाम से जाना जाता है इसे ही पितृयज्ञ भी कहते हैं! जो कर्म तिल (यव) और कूश तथा मंत्रो से युक्त होकर श्रद्धा पूर्वक किया जाय वही श्राद्ध कर्म हैं,जिस कर्म बिशेष में दुग्ध घृत और शहद से युक्त होकर सुसंस्कृत (अच्छी तरह से तैयार किए गए) उत्तम व्यंजन को श्रद्धापूर्वक पितृगण के उद्देश्य से ब्राह्मण आदि को प्रदान किया जाय उसे श्राद्ध कहते है!
श्राद्ध कर्ता का भी कल्याण:
जो प्राणी विधि पूर्वक शान्त मन होकर श्राद्ध करता है वह सभी पापों से रहित होकर मुक्ति को प्राप्त होता है तथा फिर संसार चक्र में नहीं आता ,प्राणी को पितृगण की संतुष्टि तथा अपने कल्याण के लिए भी श्राद्ध अवश्य करना चाहिए इस संसार में श्राद्ध करने वाले के लिए श्राद्ध से श्रेष्ठ अन्य कोई कल्याण कारक उपाय नहीं है,
बुद्धिमान पुरुष को यत्न पूर्वक श्राद्ध करना चाहिए श्राद्ध अपने अनुष्ठाता की आयु को बढाता है,पुत्र प्रदान कर कुल परम्परा को अक्षुण्ण रखता है धन धान्य का अम्बार लगा देता है शरीर में बल पौरुष का संचार करता है पुष्टि प्रदान करता है और यश का बिस्तार करते हुए सभी प्रकार के सुख प्रदान करता है इस लिए हर प्राणी अपने मृत माता-पिता का श्राद्ध श्रद्धा से अवश्य करें!
श्राद्ध कर्म से मुक्ति :
श्राद्ध कर्म करने से जीवन सुखमय बनता है परलोक भी सुधरता है और अंत में मुक्ति भी प्रदान करता है “आयुः प्रजां धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च, प्रयच्छन्ति तथु राज्यं पितरः श्राद्ध तर्पिताः”
अर्थात श्राद्ध से संतुष्ट होकर पितृगण श्राद्ध कर्ता को दीर्घायु संतति धन विद्या राज्य सुख स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदान करते हैं जो श्राद्ध करता है जो श्राद्ध करने की सलाह देता है और जो श्राद्ध का अनुमोदन करता है इन सबको श्राद्ध का पुण्य फल मिल जाता है श्राद्ध न करने से हानि:
पं बृजेश पाण्डेय ज्योतिषाचार्य ने यह भी बताया कि यह सर्वविदित है कि मृत व्यक्ति महा यात्रा के दौरान अपना स्थूल शरीर भी नहीं ले जा सकता है तब अन्न जल कैसे ले जा सकता है.उस समय उसे सगे संबंधी श्राद्ध बिधि से जो कुछ देते हैं वहीं उसे मिलता है शास्त्र ने मरणोपरांत पिंडदान की ब्यवस्था की है,शवयात्रा के अन्तर्गत छः पिंड दिए जाते हैं जिनसे भूमि के अधिष्ठात्री देवताओं की प्रसन्नता तथा भूत पिशाचो द्वारा होने वाली बाधाओं का निराकरण आदि प्रयोजन सिद्ध होते हैं दशगात्र को दश पिंडो के द्वारा जीव को आतिविहिक सुक्ष्म शरीर की प्राप्ति होती है, आगे रास्ते में भोजन जल आदि की आवश्यकता पड़ती है जो उत्तमषोड़शी के पिंडदान से प्राप्त होता है यदि सगे संबंधी पुत्र पौत्रादि न दें तो भूख प्यास से वहां बहुत दारुण दुःख होता है.
इसलिए पितरों के लिए बिधिबिधान से किया गया पिंडदान ही उनके लिए भुख प्यास एवं मोक्ष देता है श्राद्ध न करने वालो को कष्ट:
अपने पितरों का श्राद्ध न करने वालों को पग पग पर कष्ट का सामना करना पड़ता है मृत प्राणी बाध्य होकर श्राद्ध न करने वाले अपने सगे सम्बंधियों का रक्त चूसने लगते हैं तथा शाप भी देते हैं फिर उस शाप से परिवार को जीवन भर कष्ट ही कष्ट झेलना पड़ता है उस परिवार में पुत्र नहीं उत्पन्न होते कोई निरोग नहीं रहता लम्बी आयु नहीं होती किसी तरह कल्याण प्राप्त नहीं होता और मरने के बाद भी नरक जाना पड़ता है इस लिए जिसके उपर इस तरह की संकट है तो समझे कि हमारे पितृगण नाराज हैं और उनके प्रसन्नता के लिए श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध करें !
पितरों को श्राद्ध की प्राप्ति कैसे होती है: क्योंकि विभिन्न कर्मो के अनुसार मृत्यु के बाद जीव को भिन्न भिन्न गति प्राप्त होती है कोई देवता बन जाता है कोई पितर, कोई प्रेत, कोई हाथी, कोई चींटी, कोई चिनार का बृक्ष और कोई तृण.
श्राद्ध में दिये गये छोटे से पिंड से हाथी का पेट कैसे भर सकता है इसी प्रकार चींटी इतने बड़े पिंड को कैसे खा सकती है देवता अमृत से तृप्त होते हैं पिंड से उन्हें कैसे तृप्ति मिलेगी इन सभी प्रश्नों का उत्तर शास्त्र ने सुस्पष्ट दिया है कि नाम गोत्र के सहारे जिस जिस योनि में होंगे उस तरह की अन्न की प्राप्ति होती है जिस प्रकार गोशाला में भूली माता को बछड़ा किसी न किसी प्रकार ढूंढ ही लेता है उसी प्रकार मंत्र प्राणि के पास किसी न किसी प्रकार पहुंचा ही देता है ब्राह्मण के भोजन से ऐ श्राद्ध की पूर्ति हो जाती है धनाभाव में यदि श्राद्ध करने का सामर्थ्य नहीं है तो शाक से ही श्राद्ध कर देना चाहिए यद वह भी न हो सके तो तृण काष्ठ आदि को बेचकर पैसा इकट्ठा कर और उन पैसों ऐ शाक खरीद कर श्राद्ध करें अगर यह भी संभव न हो सके तो घास काटकर तिथि के दि गाय को खिला दें उससे भी पितर प्रसन्न हो जाते हैं और अपने कुल को आशिर्वाद देते हैं:
पितृपक्ष में पितरों के निमित्त श्राद्ध करना परम आवश्यक है!
पितृपक्ष में पार्वण श्राद्ध जरूर करें तथा ऋषि तर्पण, देव तर्पण, पितृ तर्पण,भीष्म तर्पण अवश्य करें उसके बाद पंचबलि जरुर करें गोबलि ,श्वान बलि, काक बलि, देवादिबलि, पिपिलिकादि बलि देने के बाद सपरिवार भोजन करें इस नियम श्रद्धा पूर्वक किया गया श्राद्ध जीवन में सुख समृद्धि प्रदान कर धन यश वैभव पुत्र आदि की प्राप्ति कराता है तथा इस लोक में सुख भोग कर उत्तम लोक की प्राप्ति होती है

S.P.RAWAT नई दिल्ली

Managing Director/Editor in Chief Cont.9810566149

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